धारकों का रजिस्टर
रजिस्टर खाली है। जो पहले दावा करेगा, उसका नाम यहाँ हमेशा के लिए दर्ज होगा — $3 से।
कहानी
मानसून की भारी बारिश के बाद साल में कुछ दिन सिगिरिया चट्टान की तलहटी में बने शाही जल-उद्यानों के फव्वारे अपने आप चलने लगते हैं। इनमें कोई मोटर या पंप नहीं है: पंद्रह सौ साल पहले बिछाई गई पत्थर की भूमिगत नलियों से वर्षा का जल नीचे गिरते हुए प्राकृतिक दबाव बनाता है और छेददार चूना-पत्थरों से फव्वारों के रूप में ऊपर फूट पड़ता है।
राजा कश्यप का सिंह शैल
सिगिरिया श्रीलंका के समतल मैदानों से 180 मीटर ऊँचाई पर सीधी खड़ी एक विशाल ज्वालामुखी चट्टान है। 5वीं शताब्दी के अंत में राजा कश्यप ने अपने पिता से सिंहासन छीनने के बाद इस दुर्गम चट्टान पर अपनी राजधानी और अभेद्य किला बनवाया, जिसके चारों ओर नहरें, खाइयाँ और सममित जल-उद्यान बनाए गए।
495 ईस्वी में उनके भाई सेना लेकर लौटे; चट्टान की तलहटी में युद्ध के दौरान कश्यप का हाथी दलदल से बचने के लिए मुड़ा, जिसे उनकी सेना ने पीछे हटना समझकर मैदान छोड़ दिया। स्वयं को अकेला पाकर राजा ने अपनी ही कटार से अपनी जान दे दी।
चट्टान की आधी ऊँचाई पर 'सिगिरिया की सुंदरियों' के प्रसिद्ध भित्तिचित्र हैं और उसके सामने 'दर्पण दीवार' (Mirror Wall) है, जिसे इतना चिकना पॉलिश किया गया था कि उसमें चेहरा दिखता था। 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच यहाँ आए प्राचीन यात्रियों ने इस दीवार पर सिंहली भाषा में 1,000 से अधिक सुंदर कविताएँ उकेरीं, जो एशिया की सबसे अनूठी आगंतुक डायरी है।
शिखर पर चढ़ने का मुख्य प्रवेश द्वार चट्टान में तराशे गए विशाल शेर के पंजों (सिंह-गिरि) के बीच से होकर जाता है।
1982 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित सिगिरिया प्राचीन सिंहली वास्तुकला, जल-प्रबंधन और चित्रकला का विस्मयकारी चमत्कार है।