81 · यमन · निर्माण लगभग 1533

शिबाम

पाँच सौ साल पहले मिट्टी से बनी आठ मंज़िला इमारतें, जिनमें आज भी लोग रहते हैं।

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कहानी

बाढ़ की धारा के किनारे ऊँचे चबूतरे पर सटी हुई मीनार-नुमा इमारतें

1930 के दशक में हद्रमौत की घाटी से गुज़रती हुई ब्रिटिश लेखिका फ़्रेया स्टार्क रेत के टीलों के पार पहुँचीं और पाया कि सामने जो है उसके लिए उनके पास कोई तैयार शब्द नहीं है। रेगिस्तान के बीचोंबीच, वरना खाली पड़ी घाटी की तलहटी पर, सैकड़ों सँकरी और कई मंज़िला इमारतें एक-दूसरे से सटी खड़ी थीं। उन्होंने जो उपमा चुनी वह तब से शिबाम के साथ चिपकी हुई है: रेगिस्तान का मैनहटन।

उपमा सुविधाजनक है, पर उसमें एक भ्रम है। मैनहटन इस्पात से ऊपर गया। शिबाम मिट्टी से। कच्ची ईंट — धूप में सुखाई मिट्टी और भूसा, इलाक़े में मिलने वाली सबसे साधारण चीज़ — को आठ मंज़िल तक ले जाना आज भी अभियांत्रिकी की किताबों का विषय है।

यह ऊपर की ओर क्यों बढ़ा

शिबाम हद्रमौत की मौसमी बाढ़-धारा के किनारे, ज़रा ऊँची ज़मीन पर बसा है। यह स्थिति एक साथ दो बातें थोपती है। बारिश आने पर घाटी की तलहटी पानी में डूब जाती है, इसलिए सूखी ज़मीन सीमित है। और उस सीमित ज़मीन से बाहर जाना सुरक्षित नहीं था; लोग शहरपनाह के भीतर ही रहते थे।

जो बस्ती बग़ल में नहीं फैल सकती, वह ऊपर जाती है। शिबाम के घर पाँच से ग्यारह मंज़िल तक हैं और कुछ तीस मीटर के क़रीब पहुँचते हैं। गलियाँ सँकरी हैं, घर दीवारें साझा करते हैं, और पूरा शहर लगभग पाँच सौ गुणा चार सौ मीटर में समा जाता है।

कच्ची ईंट से इस ऊँचाई तक पहुँचने का तरीक़ा यह है कि दीवार नीचे बहुत मोटी रखी जाए और ऊपर जाते हुए पतली की जाए। भूतल पर दीवारें क़रीब एक मीटर तक जाती हैं; ऊपर आधी रह जाती हैं। इसीलिए इमारतें ऊपर जाते-जाते हल्की-सी सिकुड़ती हैं — दूर से मुश्किल से दिखता है, और यही उनके खड़े रहने की वजह है।

मीनार-नुमा घर का काट: नीचे बिना खिड़की का भंडार, ऊपर रहने की मंज़िलें

भीतर का बँटवारा भी उसी तर्क पर चलता है। भूतल पर खिड़कियाँ नहीं: भंडार और मवेशी। उसके ऊपर अनाज। रहने की मंज़िलें और ऊपर से शुरू होती हैं, और सबसे ऊपर के कमरे दिन की सबसे ठंडी हवा और नज़ारा पाते हैं। यह एक ऐसा घर है जिसे परिवार खड़ी दिशा में बरतता है, और एक ही सँकरी सीढ़ी सारी मंज़िलों को जोड़ती है।

लगातार देखभाल माँगता शहर

कच्ची ईंट बारिश नहीं झेलती। शिबाम का जवाब सामग्री बदलना नहीं, बल्कि देखभाल को व्यवस्था बना देना था। बाहरी सतहों पर नियमित अंतराल पर फिर से मिट्टी का पलस्तर होता है, और सबसे खुले ऊपरी हिस्सों पर सफ़ेद चूना चढ़ता है। शहर की तस्वीरों में इमारतों की चोटी पर दिखती वह सफ़ेद पट्टी सजावट नहीं, बचाव है।

देखभाल रुक जाए तो इमारत कुछ ही बरसों में घुलने लगती है। यानी जब तक शिबाम खड़ा है, वहाँ रहने वालों को उसे हर साल दोबारा बनाना पड़ता है। शहर का पाँच सौ साल पुराना होना यह नहीं कहता कि उसकी ईंटें उतनी पुरानी हैं।

आज का अधिकांश शहर सोलहवीं सदी का है। 1532 में एक बड़ी बाढ़ पहले की बस्ती का बड़ा हिस्सा बहा ले गई, और उस आपदा के बाद शहर काफ़ी हद तक फिर से बसाया गया। जगह के रूप में शिबाम बहुत पहले से है; दक्षिणी अरब का यह हिस्सा लोबान के व्यापार-मार्गों पर पड़ता था।

अनजाना ब्योरा

शिबाम के घर आपस में सटे हैं और कई जगह दीवारें साझा करते हैं। ऊपर की मंज़िलों पर इसका एक अजीब नतीजा निकलता है: पड़ोसी इमारतों की छतें और ऊपरी मंज़िलें कहीं-कहीं रास्तों से जुड़ी हैं। शहर के एक हिस्से में आप बिना कभी गली में उतरे एक घर से दूसरे घर जा सकते हैं।

इसका व्यावहारिक अर्थ था। नीचे की सँकरी गलियाँ सार्वजनिक जगह थीं; ऊपर की सतह बड़े हिस्से में वह जगह थी जहाँ स्त्रियाँ आती-जाती थीं, और ये रास्ते गली में निकले बिना पड़ोसन के यहाँ जाना संभव बनाते थे। शहर में आवाजाही की दो अलग परतें हैं — एक ज़मीन पर, एक छतों पर।

आज

शिबाम 1982 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में आया। 2008 की भीषण बाढ़ ने कई इमारतें गिरा दीं और बहुत-सी और की नींव कमज़ोर कर दी। यमन में संघर्ष की परिस्थितियों ने देखभाल का काम और सामग्री की आपूर्ति, दोनों कठिन कर दिए हैं; 2015 में शहर संकटग्रस्त विश्व धरोहर सूची में डाल दिया गया।

यहाँ का ख़तरा अधिकांश ऐतिहासिक बस्तियों से अलग है। शिबाम को सैलानियों की भीड़ या निर्माण का दबाव नहीं, देखभाल का रुक जाना डराता है। किसी घर पर कुछ बरस पलस्तर न हो तो वह लौटाए न लौटने की हद तक जा सकता है। शहर का खड़ा रहना सीधे-सीधे इस पर टिका है कि लोग उसमें रहते रहें।

कहाँ है

Shibam
यमन

Shibam, Hadhramaut Governorate

15.9269, 48.6267